कर्म (a moral story)

(यह ऐक छोटी सी कहानी है जो बचपन की उन बेहतरीन कहानियों मे से ऐक है जिसने मेरे जीवन को बेहद प्रभावित किया है , इसको रचनात्मकता देने के लिये ऐक ताना बाना बुना गया है , उम्मीद है कि यह कहानी सदैव जिन्दा रहेगी – thelostmonk)

सुदूर पहाड़ों की घाटी और यमुना नदी के किंनारे बसा अलीगंज मात्र 50-60 परिवारों का यह गॉव ख़ुशहाली और विकास का यश ऐसे फैला रहा था जैसे यमुना का अविरल जल अपनी निरन्तरता । अलीगंज भी सभी प्रकार के लोगों से मिश्रित गॉव था जो सभी थोड़े ग़रीब , थोड़े अमीर प्रकार की आर्थिक परिस्थितियॉ सम्मिलित किये हुये था। यहॉ मुख्य व्यवसाय कृषि था लेकिन यमुना की तलवार सरीखी धार पहाड़ों को चीरती हुयी जो कण कण अपने साथ लेकर चलती है उसकी मूल्यवान रेत का भी व्यवसाय ज़ोरों पर था ।लेकिन गॉव में ज़्यादातर लोग बेहद ग़रीब थे तो संसाधनों पर केवल , कुछ आर्थिक रूप से मज़बूत परिवारों का ही हाथ था ।रेत का कारोबार व्यक्ति की प्रतिष्ठा से जोड़ा जाता था जिसके पास जितने ज़्यादा घोड़े उसकी उतनी ही ज़्यादा प्रतिष्ठा , हालाँकि गधो को भी प्रयोग में लाया जाता था लेकिन गधो का प्रयोग करने वालों को हेय दृष्टि से देखा जाता था ।

मोहम्मद एक बेहद ग़रीब परिवार से सम्बन्ध रखता था , उसके पॉच बच्चे थे और वह मेहनत मज़दूरी कर ही बच्चो का पेट पालता था । वहीं उसके कच्चे मकान से दस बारह गज पठान रहता था जो आर्थिक और पारिवारिक रूप से बेहद मज़बूत था । पठान के पास चार घोड़े थे जो कि पूरे दिन रेत को ढोने का काम करते रहते थे । पठान का व्यक्तित्व पहले से ही बेहद रूखा था लेकिन पुश्तैनी सम्पत्ति उसके पास थी वह ऊँचे कुल में पैदा हुआ था उसका रूतबा पहले से ही था । वह कई दफ़ा मज़दूरों और कारीगरों से रूखा व्यवहार करता था । वह धार्मिक तो था और नमाज़ पड़ने का भी पाबन्द था ।

मोहम्मद बेहद ग़रीबी में जी रहा था लेकिन उसके चेहरे पर कभी भी निराशा नज़र नहीं आती थी । उसने मज़दूरी कर कर के चन्द पैसों का इन्तज़ाम किया और ऐक छोटा गधा ख़रीदा। वह पठान के यहॉ मज़दूरी करता था तो पठान को बताता की कुछ वक़्त मे जब उसका गधा भी काम लायक हो जायेगा तो वह भी रेत का काम शुरू करेगा । पठान को यह सब अच्छा नही लगता था और वह मोहम्मद को नीचा दिखाने के लिये अन्य मज़दूरों के सामने रूखा व्यवहार करता था , तरह तरह के ताने मारता था लेकिन मोहम्मद हँसते हँसते फिर अपने काम मे लग जाता । थका हारा मोहम्मद घर लौटता तो अच्छे चारे वगैरह से अपने गधे का ख़याल रखता व पालन पोषण करता । महीनों दो महीनों में उसका असर दिखने लग गया वह गधा तगड़ा होने लग गया और तेज़ी से बड़ता हुआ दिखाई देने लग गया । पठान भी यह देखता तो उससे रहा नहीं गया , मन ही मन उसे ईर्ष्या हो जाती । वह सोचता की कहीं यह भी उसकी बराबरी ना कर बैठे , उसके जैसे रोबदार ना बन जाये तो वह बस परेशान हो जाता । उधर मोहम्मद बेहद शान्त ऐवम सरल क़िस्म का व्यक्ति जो सिर्फ़ पठान के जैसे बनने की चाहत रखता था वह भी चाहता था की वह भी पठान के जैसे तरक़्क़ी करे ।

वह हमेशा पठान से चीज़ें पूछता और जानने की कोशिश करता । मोहम्मद उसे अपने सपने भी बताता तो उसका यह महत्वाकांक्षी होना भी पठान को बुरा लगता । फिर जैसे जैसे मोहम्मद का गधा भी सालभर में तैयार हो गया तो मोहम्मद ने उसे काम पर लगाना शुरू कर दिया । मोहम्मद बेहद प्रेम से देखभाल करता , दिन भर की थकान के बाद हरा हरा चारा और पानी देता । इस तरह उसका जीवन भी पटरी पर उतर गया और वह अपने जीवन को और बेहतर बनाने के लिये हर सम्भव कोशिश करने लग गया । उसने कमायी का कुछ प्रतिशत बचाना शुरू किया और जब पर्याप्त धन हो गया तो ऐक और गधा भी ले लिया ।

पठान तो नमाज़ , मज़ार , दान पुण्य सब चीज़ें करता था ताकि उसकी छवि उसके व्यापार को बढ़ावा दे सके लेकिन चरित्र मे उसके जो ईर्ष्या का दामन था वो तो मानो उसकी आत्मा से लिपटा था । वह सदैव मन मे अल्लाह ताला से दुआ करता कि मोहम्मद के गधे मर जाये तो वह उसकी बराबरी कभी नही कर पायेगा । लेकिन मोहम्मद अपने आप मे ही व्यस्त , सब चीज़ों से अनभिज्ञ था कि पठान उसकी तरक़्क़ी से इतना आहत है ।

मोहम्मद का काम तो चल पड़ा , अब पठान के व्यापार पे भी असर तो पड़ा ही था धीरे धीरे मोहम्मद का नाम और काम सबको पसंद आ गया और मोहम्मद की मेहनत व लगन और उसका निष्पक्ष , निश्छल रवैये ने उसके और तरक़्क़ी प्रदान की । उसका कच्चा मकान , अब पक्का व रंगीन हो गया । उसके बच्चे उन स्कूलों मे दाख़िल हो गये जिनमें पठान के बच्चे थे । पठान रोज की नमाज़ मे दुआ फ़रमाता की मोहम्मद के गधे मर जाये तो उसकी हर फ़रियाद पूरी हो जायेगी ।

ऐक दिन तेज़ मूसलाधार बारिश हुयी और पठान के अस्तबल मे बिजली गिरी , उसके चारों घोड़े मारे गये , उसका बहुत नुक़सान हुआ । पठान तो मानो टूट गया और आज उसको मानो बदन मे कम्पकंपी की तंरगे दौड़ रही हो । वह आज की नमाज़ अदा करने के लिये मस्जिद पंहुचा ।शान्ति से ऐक गहरी सॉस ली दुआओं के हाथ पसारे और बोला

“या खुदा ! बहुत की दिल से खुदा-ई

लेकिन तुझे गधे घोड़े की पहचान न आयी “

जब वापस पंहुचा मोहम्मद उसके घर के आगे था और उसने पठान से कहा ,

पठान भाई ये पॉच हज़ार रख लो और नया घोड़ा ले लेना , मैने भी घोड़े के लिये रखे थे कि कभी नये घोड़े ख़रीद पॉऊगॉ लेकिन आपके साथ वक़्त ने अनहोनी कर दी । आप इसे रख लीजिये तब वापस दे देना जब आप को सही लगे ।

पठान निशब्द था , ऑसुओं की धारा ऐसे फूट पड़ी मानो कोई झरना अपनी ताक़त का प्रदर्शन करना चाहता हो । वह मोहम्मद से लिपट गया और कुछ नही बोला । शायद बहुत कुछ था अन्दर लेकिन ये उसका ऐसा अहसास था मानो उसको कोई खुदा मिल गया हो ।

(Moral – You can create reputation but to built character you need a kind heart )

शायर मेरी नज़र से

“शायर मेरी नज़र से”

१. बहक जाने दे ऐ वतन तेरी मोहब्बत मे
बस यही वो नशा है जो उतरता नही ।

२.   छुपा लेता है मुस्कुराकर हजारो गुप्तगू
ना जाने कितना मर्म दफ़ॉ है सीने मे ।

३.    उसकी निगाहों मे डूबे हो लाखों सवाल जैसे
न जाने किसे ढूँढती है , किसे चाहती है ।

४.      उनको शिकायत है हम बदलते नही
और हमको शिकायत उनके बदलने से है ।

५.    जिन्दा है लौ वो , कि सुलगती नही है
जलती है तन्हाई तो बुझती नही है ।

६.    लूट ले मेरे यार इस वक़्त की महफ़िल को
थम जाते है तूफॉ यहॉ , ज़िन्दगी की रफ्तार नही थमती ।

७.     बंदिशें ख़त्म कर दी , और आज़ाद हो गये
कभी इधर उड़ चले , कभी उधर उड़ चले
जिधर मन चला हम उधर चल पड़े ।!!।

८.      कल को आज बदलते हुऐ देखा है
कोयलों को भी हीरा बनते देखा है
वक़्त की बात है मेरे दोस्त
कि मजबूर भी मज़बूत हुआ करते है ,
शिद्दत से देख ऑसमॉ को ज़रा
सबसे बड़े अंधेरों से ही
सबसे बड़े उजाले हुआ करते है !!

९.     इस तरह वो मोहब्बत के अल्फ़ाज़ ढूँढते है
निगाहों मे वफ़ा की फ़िराक़ ढूँढते है
हम तो फ़क़ीर है जज़्बात की ज़मीन के
जो रेत मे भी वफ़ा की सैलाब ढूँढते है ।

१०.      कहीं दरिया बदल जाता है
कहीं दलदल बदल जाता है
तेरी मोहब्बत बदल जाती है
तेरा दिल बदल जाता है
मेरा क्या है ! मैं तो पानी हूँ
रेत हूँ और मिट्टी हूँ
जहॉ गिरता हूँ , मौसम बदल जाता है
मौसम बदल जाता है ।
११.    फ़रियादो से मंज़िले कहॉ मिलती है
हमने भी दुऑऐ हज़ार की थी ।

१२.     अब फ़ितरत की नब्ज़ पहचान ली है
कुछ कर गुज़रने की ठान ली है ।
१३.   यहॉ जीना है तो जी भर के जी ले
ग़ुजरे हुऐ ज़माने यहॉ वापस नही आते ।

१४.   हमेशा इसी मिट्टी मे रहना ‘ललित’
आसमा मे उड़ने वालों को ज़मीन नही मिलती ।

१५.  कुछ ऐसे इरादे हो ललित , कि ख्याल बदलते कारवाँ मे हो
निगाहें ज़मीन मे हो हमेशा , और तलाश ऑसमॉ मे हो ।

 

छोटा सा सपना

“छोटा सा सपना “

वो आकाश उड़ता जहाज़

और तुम्हारा पायलट बनने का सपना

बडे होकर फ़िज़िक्स की उन थ्योरिज

और ज़िन्दगी की कॉम्पलीकेटेड उलझनों मे

कहीं खो सा गया और तुम आगे निकल गये ।

होश आने पर जब सिस्टम समझ आया

तो मन चंचल , कोमल हृदय को बरगलाता गया

कि ज़िन्दगी की रफ्तार तो बस

कलेक्ट्री के काले चमचमाते कोट मे ठहरती है

जहॉ वो सब है जिसकी तुम्हारी ऑत्मा को

तुम्हारे शरीर से ज़्यादा तलाश है ….।

समय बीतता गया , उम्र बड़ती गयी

हाथ मे अब बन्दूक़ की जगह थर्मामीटर

मार्क्सवाद की जगह गॉधीवाद

पेन्टिग्स की जगह संगीत और

साहित्य की जगह इंजीनियरिंग

ऐसे थमा दी गयी और बताया गया

E-mc2 का असल ज़िन्दगी में कोई सरोकार नहीं ।

फिर उम्र के साथ साथ समझ भी बड़ती गयी

की ज़िन्दा रहने के लिये

वो पायलट , वो काले कोट या वो पेन्टिगंस

ज़्यादा ज़रूरी नहीं है क्योंकि

तुम्हारी शिक्षा तुम्हारी ज़रूरतों के हिसाब से है ।

तुम्हारे सपने अब तुम्हारी वरीयताएँ नहीं है ।

क्योंकि तुम्हारे कंधों की चौड़ाई

अब तुम्हारे पिता के बराबर है ।।

समय बीतता गया , और उम्र बड़ते गयी

किताबों की जगह अब ज़िन्दगी सिखाती गयी

कितनी अजीब सी बात है ना ,

हाथ की 20 हज़ार की घड़ी उतनाअच्छा समय नहीं बता पाती ,

जितना वो 20 रूपये वाली घड़ी स्कूल की घण्टी का बताती थी

कितनी तृष्णा थी बड़ा होने की ,

आज पता चला कि छोटा होना हमेशा से बेहतरीन था !

ये शान और शौक़त की पॉलिश

जितनी चमकदार बाहर से है

उतनी ही फीकी भीतर से है ।

अगर तुम बदल सकोगे तो ख़ुद को ज़रूर बदलना

क्योंकि तुम्हारे बाद भी कोई ना कोई

आकाश में उड़ता जहाज़ देखता होगा ।

फीजिक्स ना सही , कैमेस्ट्री पढ़ता होगा ।

वो कोई तो भगतसिंह होगा

कोई तो बारूद होगा

कोई तो फिर लौ होगी

और कोई तो इंक़लाब होगा ।

सपने देखना तो किताबें सिखा देगी

और बाकि सब ज़िन्दगी सिखा देगी ।

दुविधा

दुविधा — “lalit Hinrek”

किसान गर्व से कहता था कि मैं अन्न दाता हूं ,

इस राष्ट्र की ताकत हूं , और भविष्य निर्माता हूं ।

पर किसान अपने पुत्रों को अब , ‘किसान’ देखना नही चाहता
अपने खेतो की खुशबूओं को ,
लूटते देखना नही चाहता ।

वो बैलों की जोड़ी तो बस ,
छुटपन मे देखी थी ।

जब बकरियॉ थी, गायें थी ,
और लहराती खेती थी ।

ना पशुओं के झुण्ड है ,
ना वो बकरी वाले है ।

खण्डहर जैसे महल बचे है ,
और जंग लगे ताले है ।

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पड़ लिखकर बेटा , बाबू बन जाये
पैसा नाम कमाकर , बस इज्जत दे पाये
खेती को यहॉ मजबूरी माना जाता है ,
दीन हीन की गाथा , मजदूरी माना जाता है ।

नौकरी को सफलता का मानक मोल बैठे है ,
खुशियों को पैसो के तराजू से तौल बैठे है ।

पर ऐक दिन ऐसा होगा , दुविधा ऐसी होगी
ना गेंहू की बलियॉ होगी , भूख आटे की तरसेगी ।

ना गॉव बचे होंगे , ना कोई खेती होगी
मशीन बने मानव की , क्या खूब तरक्की होगी ।

दुविधा मे हूं , फिर क्या सीख दूंगा
ये संस्कृति भी मेरी पीढ़ी तक सीमित है ।

बेटा तू भी पड़ ले , और बाबू बन जा
जब ये भाषा भी इसी जीवन तक जीवित है ।

क्या यही तरक्की की परिभाषा है ,
बस दुविधा मे हूं ।

क्या यही जीवन की अभिलाषा है ,
बस दुविधा मे हूं !!!!

कुछ तो बदला है !

वो बचपन पहाड़ों का

बाघों की दहाड़ो का

वो बारिश मे काग़ज़ की नावों का

मिट्टी लगाये हर घावों का

वो तस्वीर , घर मे लगे ताले की

गॉव मे हर जर्जर माले की

याद दिलाती है कि कुछ तो बदला है ?

जो हर ऑगन सूना सूना है ।

वो लकड़ी के बण्डल , घासों की जोटी

वो छाछ नूण , मक्के की रोटी

बकरी के मेमने की उछल कूद

वो ककड़ी के बेलें , कद्दू के फूल

ऊन कातती चरखों की सॉचे

बॉस की टोकरीयॉ , रस्सी के फॉके

वो तस्वीर , घर मे लगे ताले की

गॉव मे हर जर्जर माले की

याद दिलाती है कि कुछ तो बदला है ?

जो हर ऑगन सूना सूना है !!

वो झबरू कुत्ते काले काले

खेतो खलिहानों के रखवाले

वो बैलों की जोड़ी अब

खेत नही जोतती है

और गौशालायें मेरी

बस गायें ही खोजती है

वो तस्वीर , घर मे लगे ताले की

याद दिलाती है कि कुछ तो बदला है !

जो हर ऑगन सूना सूना है ।

मशाले जलती थी

तो अंधेरा कम था

बिजली तो आ गयी

बस उजाला कम था ।

मकई , बाजरा , मण्डुआ , चौलाई

कुछ भी देता ना दिखाई

दूध , दही ना , घृत -माखन मेवा

ना पनघट की घाघर सेवा

हर घर है बस ख़ाली ख़ाली

सब तो है बस शहर निवासी ।

वो तस्वीर , घर मे लगे ताले की

याद दिलाती है कि कुछ तो बदला है

जो हर ऑगन सूना सूना है !!!!!

क्या चाहता हूँ ?

मेरी कहानियों में डूबा हुआ

बस बेसुध सा होना चाहता हूँ ।

छू ले जो दिल के ज़ख़्मों को

कोई वो शायर होना चाहता हूँ ।

ईश्क में इस क़दर खोना चाहता हूँ

कि जैसे बस रोना चाहता हूँ ।

मिलती नहीं मंज़िल तो क्या हुआ !

राही हूँ , बस दीवाना होना चाहता हूँ ।

कोई तो आरज़ू करे मेरे मुखौटे को जीने की ,

कोई ऐसा किरदार होना चाहता हूँ ।

मेरे काम को याद कर ले मेरे आने वाले ,

कोई ऐसा गुमनाम होना चाहता हूँ ।