क्रान्ति ( A short story of a thought)

2008 की बात है यशराज और उसका छोटा भाई वीरप्रताप सिंह कॉलेज की छुट्टियाँ ख़त्म करके गॉव से शहर की ओर लौट रहे थे । सुबह सुबह रेलवे स्टेशन पहुँचे । पोष की काली सर्द रात की ठिठुरन मानो इस अंधेरी धुँध के साथ मिलकर प्रकाश के ख़िलाफ़ मानो साज़िशें रच रही हो । अंधेरा कितना ही घना क्यों न हो ऐक छोटी सी प्रकाश की किरण अपने आस पास को ही प्रज्वलित नही करती बल्कि उसकी प्रेरणा तो मानो अनन्त खोयी हुयी भावनाओं को जीवन के खुबसूरत पहलुओं का अहसास कराती है । सुबह के पॉच बजे ट्रेन की छपक – छपक आवाज़ धीमी होती जाती है और धीरे धीरे यह ध्वनि भी मानो प्रकृति की मनोरम ध्वनियो मे खुद को समाहित कर लेती है ।

वीरप्रताप अभी अभी 12 वी पास करके गॉव आया था । यशराज कॉलेज के प्रथम वर्ष मे दार्शनिक विज्ञान की पडाई कर रहा था । यशराज अपने विचारों से प्रभावित करने वाले व्यक्तित्व मे से ऐक था , वह अपने विचारों को सदैव अलग मायनों मे जिन्दा रखना चाहता था । साधारण परिवार मे जन्मे दोनों भाई जीवन के अनुभव को काफ़ी गहराई से समझते थे । उन्हें अहसास था कि ख़ुशियों की क़ीमत क्या है !

उन्हें पता जीवन मे कटुता के अनुभव क्या है !

दोनों भाईयों मे वैचारिक तालमेल ग़ज़ब का था । वे अपने विचारों का आदान प्रदान सहजता से करते थे । पॉच बजे ट्रेन आकर रूकती है तथा क़रीब आधे घण्टे बाहर आकर दोनों टैक्सी का इंतज़ार करते है । सुबह के वक़्त मज़दूरों की बडी भीड़ रहती थी स्टेशन के आसपास । मज़दूरों के झुण्ड ठेकेदारों के इर्द गिर्द मडंराते आसानी से दिखाई देते थे । अभी सुबह के 6 बज गये थे हल्का हल्का उजाला हो गया था । धुँध हट गयी थी , चाय वाले चाय की प्यालियाँ लेकर ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रहे थे । चार पॉच झुण्ड मज़दूरों के अलग अलग अपने अपने वाक्या सुलझाने मे लगे थे । तभी पास ही मैं ऐक ठेकेदार , जो कि छ: फ़ुट लम्बा व चमकदार सफ़ेद कुर्ता पहने हुये अपने अग़ल बग़ल अठारह बीस मज़दूरों को धमका रहा था ।

मज़दूर जो की संख्या मे ज़्यादा थे लेकिन मोटे तगड़े ठेकेदार के सामने असहाय महसूस कर रहे थे । मज़दूर हाथ जोड़े कुछ विनती कर रहे थे जबकि ठेकेदार ने हाथ के स्लीव फ़ोल्ड करके कुछ बड़बड़ाये जा रहा था ।

यशराज और वीरप्रताप ने बैग साइड मे रखे और उत्सुकता से दोनों जानने के लिये पास मे पहुँच गये । तभी यशराज ने ऐक मज़दूर से पुछा

यशराज – क्या हुआ भैय्या ? मामला क्या है ?

मज़दूर – अरे बाबू जी ,

ये मालिक हमारा पूरा दिहाडी नही देता है । आधा पैमेण्ट हमेशा रोक देता है । अभी हम सब लोग छुट्टी जाना चाहते है घर को , लेकिन मालिक पूरा पैमेण्ट नही दे रहा है । ऐक महीने का पैमेण्ट रोक रखा है ।

यशराज के हाथो के रौगटे खड़े हो गये । मानो उसके अंदर हलचल हो चली । उसने जो किताबें पड़ी थी , उसने जो उनसे अर्जित किया था वह मानो उसे अन्दर से झकझोरने लगा । उसने लेनिन, चाणक्य और हिटलर के विचारों के पड़ा था। वह जानता था कि हिटलर ऐक ऐसा वक़्ता था कि जब वो बोलने लगता था तो अधमरे घायल सैनिक भी जिन्दा हो उठते थे । वह जानता था कि यह महज़ ऐक विचार मात्र नही है यह विचारो का साम्राज्य है जो आने वाले सहस्र वर्षों तक जिन्दा रहेगा । वह जानता था कैसे विचार व्यक्तित्व परिवर्तित करते है । वह जानता था विचार कैसे चरित्र परिवर्तित करते है ।

यशराज ने चार मज़दूरों को पास बुलाकर कहा

“आप लोग इतने दूर क्यों आये हो , क्या कभी आपने सोचा है ?

क्योंकि आपके पास कुछ नही है तो आप खोने से क्यों डरते है ? आप के पास पहले भी कुछ नही था और आज भी कुछ नही होगा लेकिन बदल सकते हो तो आज दिखा दो कि तुम ताक़तवर हो और तुम जिन्दा हो ।

मिलकर आओ और अपना हक़ छिन लो !

सब मिलकर मारो………..!

अगले ही पल ऐक मज़दूर जूता निकाल के चिल्लाया “मारो”

बस फिर क्या था आवाज़ें गूँजने लगी “मारो साले को “

दो तीन मज़दूर भागे और ठेकेदार को अहसास हो गया की बात हाथ से निकल गयी है । ठेकेदार भाग खड़ा हुआ और उसका जूता पॉव से निकल गया लेकिन पीछे मज़दूरों का झुण्ड भाग रहा था । ठेकेदार गिर पड़ा और मज़दूर उसके ऊपर चड गये । कोई जूता मार रहा था , कोई पॉव घूँसे मार रहा था तभी मज़दूरों मे से ऐक आदमी बीच बचाव करने आ गया । ठेकेदार ने उसके पॉव पकड़ लिये । उसने उसी समय अपने लड़के को फ़ोन किया और सबका पुराना हिसाब चुकता करने का वादा किया ।

यशराज और वीरप्रताप दोनों सब कुछ देख रहे थे तब तक दोनों की टैक्सी आ गयी । दोनों बैठे और चल दिये । यशराज बहुत खुश था इसलिये नही कि उसने कुछ महसूस किया । वह खुश था कि आज उसे अपने पढ़े लिखे होने का अहसास था । आज उसे उन विचारों पर गर्व था जो उसने संग्रहित किये थे । आज उसे अपने हृदय की क्रान्ति पर गर्व था ।

वह रात भर इस वाक्ये को ज़ेहन मे दोहराता रहा । शायद यह अब तक के उसके जीवन का सबसे बेहतरीन वाक्या था । यह सब जो उसने अर्जित किया था , उसका मात्र एक लक्षण भर था । यह उसके विचारों की एक ख़ूबसूरत क्रान्ति थी ।

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