बारह आने

(If you find my stories dirty , the society you are living in is dirty ~ Munto )

वक़्त का पहिया भी बड़ा अजीब है ऐसे दौड़ता है कि पता भी नही चलता कि समय कैसे बीत गया । पीछे मुड़कर देखता हूँ तो ऐसा लगता है कि कल की तो बात है , ऐसा लगता है कि सपना ही तो है कल मैं स्कूल मे पड़ता था , कल ही तो कॉलेज मे दाख़िला लिया था , कल की तो बात है इश्क़ मे पहली बार दिल टूटा था और आज !

आज सुबह सी लगती है , जैसे कल रात का सपना था जो रौशनी की पहली किरण के साथ धूमिल हो गया और फिर ये आज भी ऐक कल बन जायेगा । इस कल मे न जाने कितनी हसीन कहानियॉ छुपी होगी जो आपको हंसाती होगी , कई बार रूलाती भी होगी और कई बार ये अहसास भी कराती होगी कि अगर ऐसा किया होता तो ऐसा होता । ज़िन्दगी का ताना बाना ही तो है ये कहानियाँ जो आपको आप बनाती है और हमको हम बनाती है ।

ऐक दिन सब कुछ यहीं छूट जायेगा , राजा और रंक दोनों ही ख़ाली लौट जायेगे लेकिन वो राजा भी ग़रीब ही होगा जिसकी ऐक भी कहानी उसके बाद याद नही की जायेगी और वो प्रजा का ऐक वो हिस्सा भी है जिसने कहानियों को जिया है और जो हमेशा हमेशा के लिये यहॉ किसी न किसी की यादो मे , किन्हीं हिस्सों मे , किसी ख़ुशबुओं मे , कहीं न कहीं मिलता रहेगा और हमेशा याद किया जाता रहेगा ।

बारह आने भी साठ के दशक की कहानी है । आज बूढ़ा हो चुका हूँ और कहानी लिखते लिखते अपना वो छुटपन जीना चाहता हूँ । गॉव मे मेरे पिता ऐक छोटे से किसान थे और मॉ बेहद ही धार्मिक गृहिणी । हम चार भाई बहन थे जिनमें सबसे बडी बहन थी , फिर मैं , फिर छोटा भाई और सबसे छोटी बहन थी ।मॉ रोज पूजा पाठ करने वाली महिला थी और हम भी सुबह शाम पूजा मे शामिल हो जाया करते थे । मैं छठी कक्षा मे पड़ता था तथा छोटा भाई पाँचवी कक्षा मे पड़ता था । हम दोनों बहुत ही उद्दण्डी थे तथा ख़ूब लड़ाई किया करते थे । छोटा भाई मुझसे भी ज़्यादा उद्दण्डी था जो कभी कभार किसी गॉव वाले के बादाम तो कभी सन्तरे वग़ैरह अपने दोस्तों के साथ चुराता था । कई बार उसकी शिकायत घर मे भी पहुँच जाती थी तो पिता जी उसे ख़ूब मार लगाते । गॉव मे अन्धविश्वास बहुत ज़्यादा होता था लोग अगर बीमार भी हो जाते तो डॉक्टर के पास कभी नही जाते बल्कि गॉव के देवता या माली (जिस पर देवता अवतरित होता है ) को बुलाकर झाड़ फूँक करवाते थे । आज का दौर बदल गया है लोग ज़्यादा शिक्षित ऐवम जागरूक हो गये है ।

बचपन बेहद नाज़ुक होता है जो आस पास का वातावरण होता है वह आपके चरित्र मे समा जाता है । यह कहीं न कहीं आपके भविष्य मे जीवन पर्यन्त प्रभाव डालता है । हम लोग स्कूल से आने के बाद कन्चे (कॉच की गोलियाँ) खेलते थे । उस वक़्त यह हमारे वक़्त का सबसे पॉपुलर खेल था । आजकल तो लोग पब जी (PUB G) न जाने कैसे कैसे आभासी (virtual) गेम खेलते है लेकिन वो दौर अलग था । हमारे पास संसाधन कम थे लेकिन वक़्त बेहिसाब था । एक आने में दस कन्चे मिलते थे यदि कोई दुकान से लेता था लेकिन ऐक आने के बारह मिलते थे यदि हम साथ के लड़कों से लेते थे । मेरे साथ के कुछ दोस्त और मेरा भाई हम सब मिलकर खेलते थे और बहुत दिलल्गी से खेलते थे । एक बार मैं बुरी तरह हार गया मेरे सारे कन्चे दोस्तों ने जीत लिये । अब मेरे पास न तो पैसे थे कि मैं कुछ कन्चे ख़रीद सकू और न कोई मुझे उधार देना चाहता था । मैं निराश होकर घर चला आया । पिता जी घर पर नहीं थे और मॉ गायों को चारा डालने गोशाला गयी थी । बड़ी बहन रसोई में रोटियॉ बना रही थी और सबसे छोटी रसोई में खेल रही थी । मैं अंदर गया और पता नहीं क्या ख़्याल आया की सीधा पूजा वाले कमरे में गया । वहॉ मैंने देखा की पूजा की थाली में कुछ सिक्के रखे है लेकिन सामने भोलेनाथ की मूर्ति और तस्वीरें थी और मॉ दुर्गा की मूर्ति तो ऐसा लग रहा था कि मुझे ही देख रही हो । कुछ देर सोचा फिर तृष्णा ने आस्था पर हावी होकर कहा , भोले बाबा माफ़ कर देना मुझे पैसों की सख़्त ज़रूरत है और पैसे उठाकर घर के पीछे के खेत में और स्लेट के नीचे रख दिया । मैं कॉप रहा था तो पैसों को गिन भी नहीं पा रहा था यह अक्सर होता है जब भी कोई ग़लत काम करते है । पैसे रखने के बाद बड़ा अच्छा लग रहा था कि अब मैं भोलेनाथ की कृपा से अमीर हो गया हूँ । मैंने किसी को नहीं बताया और बिल्कुल शरीफ़ बच्चा बनकर पडाई करने में जुट गया । मॉ ने शाम की पूजा मे देखा तो उन्होंने पिता जी को बोला ।

पिता जी ने रात का खाना खाते हुये सबसे पूछा कि मंदिर से बारह आने ग़ायब हुये है , किसने लिये है ? ईमानदारी से बताओ की चोर कौन है ?

सबको छोटे भाई पर शक हुआ क्योंकि वह उद्दण्डी काम करता रहता था । छोटा भाई देवते की क़सम खा खाकर अपनी बेगुनाही के सबूत देता रहा लेकिन उसकी बात पर कोई विश्वास ही नहीं कर पा रहा था ।

पिताजी ने सबसे पूछा । बड़ी बहन ने भी कुल देवता की क़सम खाई कि उसने नहीं लिये है । अब मेरी बारी आयी तो मैंने भी क़सम खा ली क्योंकि मैंने तो चोरी करने से पहले एक संवाद कुल देवता के साथ जारी रखा ही था फिर अब एक झूठ पहले झूठ को बचाने के लिये और सही ।कोई भी ये मानने को तैयार नहीं था कि किसने पैसे लिये है हॉलाकि छोटे भाई को सर्वसम्मति से चोर घोषित किया जा चुका था ।

फिर पिताजी ने अगली सुबह सबको बुलाया और बताया की आज वह देवता के माली को बुलायेंगे और देवता यह बता देगा की चोर कौन है । अभी भी बता दो चोर कौन है वरना पूरे गॉव में बड़ी बेइज़्ज़ती होगी । अब मुझे डर लगने लग गया की अगर देवता ने सही में मुझे पकड़ लिया तो फिर क्या होगा ?

मैंने पिताजी को कहा की हम लोग ढूँढ लेंगे तो पिताजी ने कहा की ठीक है ढूँढो वरना दोपहर में फिर देवता के माली को बुला लूँगा । इसके बाद बहने घर के अन्दर ढूँढने लग गयी कि कहीं इधर उधर न गिर गये हो । मैं बड़े चालाकि से घर के पीछे चला गया और छोटे भाई को भी लेकर गया । मैंने स्लेट को नीचे पैसे छिपाये थे और क्योंकि वहम खेत में काफ़ी स्लेटे थी तो मैंने एक जानवर की हड्डी उसके ऊपर निशानी के तौर पर रखी थी । अब हम ढूँढने लग गये लेकिन दुविधा ये थी कि मैं कैसे निकालू यह पैसे तो मैंने छोटे भाई को बड़े मासूमीयत के साथ बोला

“भाई कई बार चोर कुछ निशानी छोड़ देते है , ढंग से ढूँढना उधर जैसे कई बार हड्डी वग़ैरह वे निशानी के तौर पर छोड़ देते है “

छोटा भाई मेरे वास्तविक इरादों से बिल्कुल अनभिज्ञ और धीरे धीरे उस स्लेट के पास जा पहुँचॉ जहाँ बारह आने रखे थे । जैसे ही उसने स्लेट हटाई बारह आने दिखाई दिये ।

वह चिल्लाया “भाईजी पैसे मिल गये “

जैसे ही वह चिल्लाया मैं घर की तरफ़ भागा और चिल्लाता हुआ पिता जी के पास गया और बोला पिताजी पैसे छोटू ने ही लिये थे उसी को मिले है वो ही चोर है ।

छोटा भाई चिल्लाता हुआ आया और बोला की पिताजी पैसे मिल गये । मैं तैयार नही था कि मुझ पर बात आये लेकिन जब छोटे भाई ने पूरा वाक्या सुनाया कि कैसे मैंने कहा की चोर निशानी छोड़ देते है तो पिता जी को मालूम पड़ गया कि पैसे मैंने चुराये थे । पिताजी मुस्कारये और बोले की बता दो वरना शाम को देवता बुला लेंगे । मैंने डर से स्वीकार कर लिया क्योंकि मुझे लगता था शाम को अगर देवता आ गये तो मुझे पकड़गें । बाद मे कई सालो तक इस बात को लेकर मेरी ख़ूब खिंचाई होती थी । आज भी ऐसा लगता है जैसे कल की ही बात है और आज भी मेरे ज़ेहन में ज़िन्दा है । हम आज जब भी कभी इसका ज़िक्र करते है तो बस हँसते है कि कितने मासूम थे वो छुटपन के दिन ।

उसके बाद धीरे धीरे यह भी समझ आया कि देवता तो मन का डर है जो यह अहसास दिलाता है कि बुरा मत करो वरना देवता दण्ड देगा , फिर धीरे धीरे समझ आया कि देवता तो कर्म है जो जीवन का सार है कि बुरा करने से बुरा ही होगा । जैसे जैसे बड़े होते गये वो बारह आने सीख बनते गये कि मुश्किल से मुश्किल वक़्त में भी ग़लत क़दम मत उठाओ ।बारह आने ने मुझे यह भी सिखाया कि हर बच्चा बेहद क्रियेटिव होता है जो बचपन से ही कहानी बुन सकता है 🤠🤠

बारह आने सिर्फ़ कहानी नहीं है बल्कि एक जीवन का अंग है जो ताउम्र साथ रहेगा ।

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